शाम का पैगाम आपके नाम : सबके विधाता "पापा"

तैयार है फिर एक शाम ढलने को थके हुए दिन से रात में बदलने को बुला रहे है खाली पड़े घोसलें गगन में सैर कर लौटते हुए पंछियों को। चंद रुपये की तलाश में रोटी कमाने निकले हालात से मजबूर वक़्त के मजदूर के इंतजार में बैठा है उसका परिवार और सुना घरबार रसोई के द्वार पर । बैठी है एक माँ अपने बच्चों के लिए कुछ पकाने को मानो कह रही हो बच्चों से पापा को आने " दो। चूल्हे के बाहर पसरी है सूखी लकड़ियाँ वीरान पड़े है बर्तन नयन बने है नयनों के दर्पण एकटक निहार रहे है सब राह तभी हर्ष से चीखती है वो नन्ही बालिका वाह वो देखो आ गए पापा। फिर क्या खत्म हुआ सहसा घर का सन्नाटा। हाथों में है सब्जी, दाल, चावल, तेल, मसाले और आटा अब नन्ही परी खायेगी अपना मनपसन्द पराठा ;वो ,ओट में छिप कर तवे पे देख रही है जो ....

इन्हें आज रात नींद नसीब होगी बेशक पर कल भी जारी रहेगा वही इंतजार शाम होने तक । ढ़लते सूरज के उस ओर आड़ी-तिरछी पगडंडियों पर गमछे में दिन भर की मेहनत का प्रसाद लेकर घर की ओर डगमगाते पाँवों तले इनके विश्वाश की जमीन के फासलों को कम करता इनका भाग्य- विधाता :- घर की दहलीज के भीतर बैठी बिंदी का सुहाग, उसके माथे का सरताज, घोर अँधेरे में उम्मीद की लौ सा टिमटिमाता चिराग इन भूखे खिलौनों का अन्नदाता हाँ-हाँ इनका " पापा " । -

दिन के महत्व को समझने के लिए ये शाम काफी है ।

इंसानियत जिंदा है मेहनत के हाथ आज भी, ये बतलाने को ये पैगाम काफी है।




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