हम बच्चों का नानी-घर 🏡


बात सोलह आने सच है बड़े चाहे जितनी भी बड़ी-बड़ी बातें कर ले मगर माहौल तो हम बच्चें ही बनाते है एकदम से धूम मचा ले वाले जॉन अब्राहम की कसम । ये कहानी किसी रियासत की नहीं एक घर की है जो शहर के गली-मोहल्लों से ऊब कर मानो अपनी वर्षों की जमा थकान मिटाने आहिस्ता-आहिस्ता सरकते हुए गाँव में आ बसा है ; ये अब किराये का नहीं रहा इसने यहाँ स्थाई बेड़ा डाल लिया है । लोग वही है पर वातावरण बिल्कुल बदल गया है अब यहाँ दहलीज़ पर बिखरी आड़ी-तिरछी चप्पलें नहीं गिनी जाती ना ही कोई खिलखिलाते दाँतों का हिसाब लेता है गिने जाते है तो बस लम्हें जो थोड़ा और होने चाहिये थे शायद ऐसा ही हर बार तो लगता है । पानी की टँकी भर गई है अब मोटर सीधा रात को चलेगा ये सुने तो ज़माना हो गया । कब आना है कब जाना है मेरी मर्जी .... 😁😂🤣

        हम भाई बहनों में विविधता भी तो इतनी है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत भी अपने हाथ खड़े कर दे । खैर जाने दीजिये गुण-दोष गिनाने का सही वक़्त नहीं ; पता नहीं किस बात पे कौन कोई नया बवाल खड़ा कर दे । चार बहनों के नौ-नौ ठिया बच्चें और सब एक से बढ़कर एक । सोनू , शिबू ,शालू ,प्रिया ,टप्पू ,खुशी ,छोटी ,भोला ,बिल्ला ( नाम पर मत जाना लड़की है लड़की ) और ऊपर से चार चाँद मामा के दो सयाने अंशु और अभी हो गए ना पूरे ग्यारह अब क्रिकेट ,हॉकी या फिर फुटबॉल खेलो सभी । पर एक साथ सबका जुटान तो संयोग की ही बात है । वैसे टुकड़ों में जिन्दगी का जमावड़ा यदा-कदा लग ही जाता है । 

     शहर जैसी चकाचौंध तो नहीं पर सादगी में बड़ा सुकून है । हरियाली के बीच ताजी हवा है जो हर रोग की दवा है । नाना जी के साथ जो सुख ऊपर के दो शक्तिमानों ने सरकारी बंगले में लिया था वो तो हम सभी जूनियर जी कभी ले नहीं पाए पर इस भागमभाग वाली दिनचर्या से कुछ आराम फ़रमाने को बेचैन मन हिलोरें मारते रहता है कि कुछ दिन तो गुजार आये गांव में ,और इन सुनामी सरीखे लहरों का सफर आकर रुकता है मम्मी के आगे - " हम फिर से नानी घर कब जायेंगें ? "  

खुशी मन के आँसू पोछ कर फिर से हँसने का अभिनय करती हुई वीडियो कॉल काट देती है ......

बच्चों के मन की आवाज 

@shadon_ke_ashish ✍️






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