मैंने अब खुद के लिए पढ़ना छोड़ दिया है जीवन ने जैसे कोई नया मोड़ लिया है उन परम्परागत अकबर , बाबर और अशोक के किस्सों से नाता तोड़ लिया है अब चंद ख्वाबों को ही जो टूट रहे है गुजरते वक़्त के साथ किताबों से जोड़ दिया है माना कि मेरी जीत से आप परिचित नहीं मगर मैं हारा नहीं हूँ वो मंजिल मिली ना सही पर मैं कोई आवारा नहीं हूँ आसमान से बिछड़ा जरूर हूँ किंतु टूटा हुआ तारा नहीं हूँ करवटें बदलता रहा है मेरा सफ़र नजारें बदल गए है मगर बदली ना नज़र मैं हर उस मैं के साथ हूँ जिसके भीतर हम बनने वाली बात है जो भी मिला है फुरसत से मुझसे किसी डगर उसके दिलों दिमाग पर जरूर है मेरी बातों का असर शांत है विशाल इतना मानों प्रशांत है मेरे अनुभवों का समंदर सबको कहां समझ आएगी ये उफनती लहर आज भी मेरा धैर्य उस दरिया की दृढ़ प्रतिज्ञा के समान है जिसने सागर से मिलने को लगा दी अपनी जान है सूरज सा संकल्प है जिसे रोज निकलना है चांद सा विकल्प है जितनी मिले रौशनी उसी से चमकना है इस अखंड शांति की तलाश ने भी जमाने को एक शोर दिया है अध्यात्म की अनुभूति ने आत्म पहचान पर जोर दिया है मैंने अब खुद के लिए पढ़ना छोड़ दिया है जीवन ने...
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