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मैंने अब खुद के लिए पढ़ना छोड़ दिया है ✍️

मैंने अब खुद के लिए पढ़ना छोड़ दिया है जीवन ने जैसे कोई नया मोड़ लिया है उन परम्परागत अकबर , बाबर और अशोक के किस्सों से नाता तोड़ लिया है अब चंद ख्वाबों को ही जो टूट रहे है गुजरते वक़्त के साथ किताबों से जोड़ दिया है माना कि मेरी जीत से आप परिचित नहीं मगर मैं हारा नहीं हूँ वो मंजिल मिली ना सही पर मैं कोई आवारा नहीं हूँ आसमान से बिछड़ा जरूर हूँ किंतु टूटा हुआ तारा नहीं हूँ करवटें बदलता रहा है मेरा सफ़र नजारें बदल गए है मगर बदली ना नज़र मैं हर उस मैं के साथ हूँ जिसके भीतर हम बनने वाली बात है जो भी मिला है फुरसत से मुझसे किसी डगर उसके दिलों दिमाग पर जरूर है मेरी बातों का असर शांत है विशाल इतना मानों प्रशांत है मेरे अनुभवों का समंदर सबको कहां समझ आएगी ये उफनती लहर आज भी मेरा धैर्य उस दरिया की दृढ़ प्रतिज्ञा के समान है जिसने सागर से मिलने को लगा दी अपनी जान है सूरज सा संकल्प है जिसे रोज निकलना है चांद सा विकल्प है जितनी मिले रौशनी उसी से चमकना है इस अखंड शांति की तलाश ने भी जमाने को एक शोर दिया है अध्यात्म की अनुभूति ने आत्म पहचान पर जोर दिया है मैंने अब खुद के लिए पढ़ना छोड़ दिया है जीवन ने...

“उत्कृष्ट कला अनुभव को प्रदर्शित करती है और सत्य को उद्घाटित करती है”

            मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आयाम उसका अनुभव है। अनुभव ही वह तत्व है जो मनुष्य को साधारण जीवों से अलग करता है, क्योंकि अनुभव ही भावनाओं, कल्पना और चिंतन को जन्म देता है। कला इन्हीं अनुभवों की मूर्त अभिव्यक्ति है। जब मनुष्य अपने अनुभवों, संवेदनाओं और विचारों को किसी दृश्य, श्रव्य या साहित्यिक रूप में व्यक्त करता है, तो वह कला बन जाती है। इस कला की उत्कृष्टता इस बात में होती है कि वह किस हद तक मानवीय अनुभव की गहराई को प्रस्तुत कर सके, और किस सीमा तक वह जीवन के सत्य को उद्घाटित कर सके। इसीलिए कहा गया है कि श्रेष्ठ कला केवल सुंदरता नहीं रचती, बल्कि सत्य का साक्षात्कार कराती है।     कला की उत्पत्ति वस्तुतः मनुष्य के भीतर से होती है। जब व्यक्ति किसी गहन अनुभूति से गुजरता है—चाहे वह आनंद की हो या दुःख की, प्रेम की हो या विरक्ति की—वह इसे किसी रचनात्मक रूप में व्यक्त करने की प्रेरणा प्राप्त करता है। यह प्रेरणा ही कला के जन्म का आधार है। इस दृष्टि से कला मानवीय अनुभव की भाषा है। वह उन जटिल भावनाओं को भी व्यक्त कर देती है जिन्हें शब्दों में कहना कठिन होता है। उदाहरण के लिए, एक च...

“विचार ही जीवन का आधार है, विचारहीन मानव पशु के समान है”

  मनुष्य केवल शरीर या संवेदना का पुतला नहीं, बल्कि एक विचारशील सत्ता है। उसके भीतर विचार करने, तर्क करने, और निर्णय लेने की जो अद्भुत क्षमता है, वही उसे बाकी जीव-जंतुओं से अलग करती है। यही विचार शक्ति मानव जीवन का वास्तविक आधार है। यदि इस विचार शक्ति को मनुष्य खो दे या उसका उपयोग न करे, तो वह बाहरी रूप से भले ही मनुष्य दिखाई दे, परंतु भीतर से पशु के समान जीवन जीने लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि विचार ही वह शक्ति है जो मानव को अच्छाई और बुराई, सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय में भेद करने की क्षमता प्रदान करती है। विचार ही जीवन की दिशा तय करता है। यह मनुष्य के कर्म, व्यवहार और नैतिकता का मूल स्रोत है। जिस दिन मनुष्य सोचना बंद कर दे, उस दिन उसकी मानवता भी समाप्त हो जाती है।       विचार का अर्थ केवल मन में कुछ कल्पना करना नहीं है, बल्कि यह बौद्धिक और नैतिक विवेक का संयोजन है। विचार मनुष्य को आत्मचिंतन, आत्मविश्लेषण और आत्मसंवेदन की दिशा देता है। जब कोई व्यक्ति परिस्थितियों को समझकर, तर्क और अनुभव के आधार पर निर्णय करता है, तब उसका जीवन जागृत और सचेत कहा जा सकता है। इसके विपरीत जब वह सोचने-समझने...

कर्तव्य पथ

कर्तव्य पथ पर घना कोहरा है  दूर तक पसरी धुंध है  पर कैसे चलूं मैं  इन आंखों को मूंद के रात का अंधेरा  छंट चुका कबका मगर गुम है  ओस की चादर में सूरज की लाली सड़क मैदान  खेत खलिहान  सब लगते है खाली आसमां से जमीं तक  हर ओर नमी है  आलस हावी है मस्तिष्क पे बस शायद एक कदम बढ़ाने की कमी है  उधर लोगों को रजाई की नरमी ने जकड़ रखा है  इधर ट्रेन की धीमी रफ्तार ने जीवन की चाल को पकड़ रखा है  कोई चम्मच में चिपके च्यवनप्राश को चाट रहा है  तो कोई चाय की हसीं चुस्कियों की राह ताक रहा है  किसी को नहाने से परहेज है  तो किसी की बस सोच कर ही धड़कने तेज है  फिर भी जिसे निकलना है नित्य कर्तव्य पथ पर  उसके लिए क्या आग की दरिया और क्या ये सर्द हवा  लिखने को अपनी दास्तां  लो सफ़र शुरू हो गया  ये माना कि  कर्तव्य पथ पर घना कोहरा है  दूर तक पसरी धुंध है  पर कैसे चलूं मैं  इन आंखों को मूंद के ..... 🌱SwAsh💚 @shabdon_ke_ashish✍️

एक स्त्री 🌱

क्या तुम्हारी तबीयत से वो अपनी तबीयत भी जोड़ देगा क्या ? जिस आदमी के लिए तू औरत बनी है लड़की से वो आदमी अपनी आदमियत छोड़ देगा क्या ? कभी पूछ अपने दिल से ज़रा ऐ दरिया जिस ओर मुड़ी है तू शौक से क्या उस ओर वो भी समंदर को मोड़ देगा क्या ? ये किस भ्रम में है तू सात जन्मों के क्या इस जन्म में ही वो रिश्ता तोड़ देगा क्या ? जिस ओर पलकें बिछाए बैठी है तू ओ स्त्री क्या वो भी अपनी नजर उस ओर देगा क्या ? जिस सम्मान का अभिमान पाल रखा है मन में तूने क्या तेरे मान की लाज वो थोड़ा और देगा क्या ? जिन लम्हों के दामन में जीना है तुझे क्या वो हसीं दौर देगा क्या ? जिस खामोशी से सबकुछ सहा है तुमने क्या वो दबा हुआ सा ही सही तनिक शोर देगा क्या ? जिन रिवाजों और तानों ने रुलाया है तुझे क्या वो उनका गला मरोड़ देगा क्या ? जिसके लिए तू आ गई है सब छोड़ के क्या तेरे लिए भी वो सबको छोड़ देगा क्या ? क्या तुम्हारी तबीयत से वो अपनी तबीयत भी जोड़ देगा क्या ? जिस आदमी के लिए तू औरत बनी है लड़की से वो आदमी अपनी आदमियत छोड़ देगा क्या ?                     -  एक स्त्री ✍️ @shabdon_ke_ashish ✍️

आप भी एक गांधी है

अगर आपके भीतर भी विचारों की आंधी है  तो समझिए कि आप भी एक गांधी है  जिसे भय नहीं हथियारों का  जो शक्तिपुंज है विचारों का  जो सबको साथ लेकर चल सके  जो अकेले भी भीड़ की तरह निकल सके  जिसके पास सत्याग्रह की शक्ति हो  जिसकी वाणी में भक्ति हो  जो अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हो  सत्य और अहिंसा ही जिसका रक्त हो  जो नदी की तरह अपना रास्ता खुद बनाता हो  भटके हुए को सन्मार्ग पर लाता हो  जो धर्म की राजनीति नहीं राजनीति का धर्म जानता हो  जो अल्लाह और ईश्वर को एक मानता हो  जिसकी जुबान में स्वतंत्रता और सीने में आजादी है  अगर आपके भीतर भी विचारों की आंधी है  तो समझिए आप भी एक गांधी है  - आशीष ✍️

71st BPSC PRE

ये इम्तिहान सिर्फ आपके ज्ञान का नहीं बल्कि आपके धैर्य का भी है । अतः मन को शांत  रखे । कुछ प्रश्नों के स्तर अगर बहुत निम्न हो तो उसमें विकल्पों के साथ हेरा फेरी हो सकती है इसलिए सावधान रहे । कथन वाले प्रश्नों में key words का ध्यान रखे । सत्य , असत्य , सही , गलत आदि का विशेष ध्यान रखे । कुछ प्रश्नों से आपका परिणाम निर्धारित नहीं होने वाला क्योंकि कुल 150 प्रश्न है और सभी के अंक समान है । आपका प्रयास होना चाहिए कि आप अपनी तरफ से आश्वस्त हो कि कितना अटेम्प्ट करना ठीक होगा । समय पर्याप्त रहता है अतः एक घंटा होते ही जितने प्रश्न आपने लगा लिए है उसे पहले अपने omr में colour कर ले और फिर बाकी बचे प्रश्नों को बनाए और omr में फील करते जाए । अंतिम के 15 मिनट में वैसे प्रश्नों में रिस्क ले जिसमें आप दो विकल्पों में कन्फ्यूज्ड हो । मगर ये रिस्क लिमिटेड ही हो तो बेहतर है । आखिरी के इन 5 दिनों में PYQ को ही पढ़े , विशेष कर बिहार विशेष और विज्ञान के प्रश्नों को अवश्य देखे । धन्यवाद 🙏 All the best Team Mainstream ✍️

The Rising of A Team of your Dream MAINSTREAM ✍️

मित्रों ,        जीवन संघर्ष का ही तो दूसरा नाम है पर अपने स्तर से ऊपर उठने के बाद कुछ लोगों को ये भ्रम हो जाता है कि उनसे बेहतर कोई और हो ही नहीं सकता । सच ही तो कहा गया है कि सर्वश्रेष्ठ की संकल्पना खुद को अभिमानी बनाने की अवधारणा मात्र है ।      खैर जो भी हो कौन क्या कर रहा है इससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि हम इस विषय पर ध्यान केंद्रित करे कि हम क्या कर सकते है , कैसे कर सकते है और कितना कर सकते है ।  शिक्षा का बाजारीकरण आधुनिक युग की एक बड़ी समस्या है जिसमें बेचारे छात्र समूह हर दिन पीस रहे है , जब ये अवांछनीय दबाव मानसिक चेतना को जागृत करती है तो विचलित मन एक नए विकल्प की तलाश करने लगता है , एक ऐसा संस्थान जो छात्रों की व्यथा को समझे और उनके हित के लिए दिन रात प्रयासरत हो ।        कहने को तो सभी अपने अपने हिसाब से अपनी दुकान ही चला रहे है पर क्या ये विशाल छात्र परिवार बस खरीदार बन कर ही रह जाए और हर वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर खुद को ठगा हुआ और छला गया महसूस करे ये सही है , अगर ये नियति और परम्परा बन गई है तो हम इसे बदलना चाहते है । हम छात्रों के साथ जुड़कर उनकी हर एक समस्या हर एक पह...

वक़्त बदलता नहीं , वक़्त को बदलना पड़ता है ।

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    हमने अक्सर सुना है कि वक़्त की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि चाहे जैसा भी हो गुजर जाता है ; हम बहती हुई दरिया की किसी बूंद को दोबारा नहीं छू सकते । जिस पल में जी रहे है वो पल लौट कर नहीं आयेगा। पर क्या वाकई वक़्त बदलता है या वक़्त को बदलना पड़ता है । इस सवाल के दो आयाम है एक ये कि जीवन को वक़्त के भरोसे छोड़ दे और वक़्त अपने हिसाब से चलता रहे और दूसरा ये कि वक़्त को अपने अनुसार बनाने के लिए निरंतर प्रयास जारी रखा जाए । अब जरा सोचिए वक़्त तो हर हाल में बदलेगा पर आपने इसे अपने अनुरूप बदलने के लिए किया क्या है ?    " वक़्त एक नदी है जो बहती जा रही है , दिशा और दशा तय करेगी सागर तक का सफर "          इतिहास के पन्नों को पलटने पर हम पाते है कि जिसने भी जीवन के उद्देश्य को समझकर लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया उसने इस समय के पहिए को अपने हिसाब से घुमाया या फिर इस पहिए की रफ्तार को पहचान कर उसके ताल से ताल मिलाकर चलता चला गया । और वो लोग जो नियति के भरोसे बैठे रह गए ये सोचकर कि उनका समय आयेगा दरअसल वो समय कभी आया ही नहीं क्योंकि समय बदलता जरूर है मगर उनके लिए नहीं जो जीवन के किसी मोड़ पर ठह...

सपना वो नहीं जो आप नींद में देखते है बल्कि सपना वो है जो आपको सोने ना दे

ये सोलह आने सच है कि सपनों की इस हसीन दुनिया में सबकुछ सपने जैसा ही तो लगता है पर उसके लिए यथार्थ है जिसने अपने सपनों को सोने नहीं दिया , उसे अतीत की पुरानी बस्ती में खोने नहीं दिया और उसे इतिहास के पन्नों में दफन होने नहीं दिया ।  " मंज़िल भी तो बस सफ़र का ही एक हिस्सा है क्योंकि जिंदगी ठहर जाने का नाम नहीं "      आइए इस लघु निबंध में हम सपनों को साकार करने के तरीके को जानने तथा जीवन के उद्देश्य को समझने का प्रयास करते है ।       उपरोक्त शीर्षक हमारे भूतपूर्व यशस्वी राष्ट्रपति जिन्हें हम मिसाइलमैन के नाम से संबोधित करते है का एक कथन है पर असल में इस एक कथन में ही सम्पूर्ण जीवन का दर्शन है । सपने देखना भला किसे पसंद नहीं , पर क्या मनपसंद सपने सोते हुए आ सकते है और अगर यदा कदा आ भी जाए तो नींद के टूटने के साथ ही टूट कर बिखर जाते है और फिर शायद टुकड़े मात्र ही रह जाते है । पर जरा सोचिए अगर कोई सपना खुली आँखों से देखा जाए और उसके पूरा होने तक अपना सर्वस्व लगा दिया जाए तो फिर उसे सच होने से कौन रोक सकता है ।   " सपनों की दुनिया में कोई सच तलाशते है , कल्पना ही तो यथार्थ की ज...

MAINSTREAM :- A strong walk to BIPARD

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https://t.me/+J46Kx-04iWcwZGJl मित्रों , जैसा कि आप सभी जानते है BPSC ने 71वी संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा के लिए 1298 पदों पर आवेदन प्रक्रिया को पूरा कर लिया है अब वक्त है अपनी तैयारी को दुरुस्त करने का और लगभग 6 लाख की भीड़ में से खुद को निकाल कर 15 हजार की उस सूची में शुमार करना जो मुख्य परीक्षा का हिस्सा होंगें । असली लड़ाई तो प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण होने के बाद ही शुरू होगी जो आपको आपकी मंज़िल यानी BIPARD तक ले जाएगी ; तो आइए आपकी इस यात्रा में हम आपके मार्गदर्शक और सारथी बनते है और आपके सपनों को यथार्थ में बदलने की तरफ एक मजबूत कदम बढ़ाते है । फिर देर किस बाद की आज और अभी जुड़िए अपनी Dream Team जी हां MAINSTREAM से 👇👇 https://t.me/+J46Kx-04iWcwZGJl Click on this link to join Thank you Team MAINSTREAM

वो बिल्ला है या फिर कोई पूर्वज :- मोहब्बत और दहशत की कहानी ✍️

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बात है मेरे नानी घर की , नानी तो अब नहीं रही पर है तो नानी का घर ही । ये किस्सा है भोजपुर जिले के अंतर्गत आरा शहर के आनंद नगर मोहल्ले का । एक ओर पूरे पिपरहिया रोड क्षेत्र में मंटू का खौफ तो दूसरी तरफ मेरे नानी के घर में अचानक से आ धमके और डेरा जमाये बिल्ले का रहस्य दोनों ही इस कस्बे में चर्चा का विषय है । वैसे तो इस बिल्ले ने अभी तक कोई नुकसान नहीं किया पर इसकी रहस्यमयी उपस्थिति और क्रियाकलाप सोच-विचार करने पर मजबूर कर देते है । इसे कितना भी भगाओ ये जाता नहीं है इसे कोई और घर क्यों भाता नहीं है ? एक बार तो मेरे ममेरे भाई ने इसे 6-7 km दूर छोड़ आने की योजना बनाई फिर क्या स्कूटी उठाई और हवा से बातें करता हुआ कुछ ही मिनटों में वो बिल्ले को घर से दूर रख आया । क्या गजब की खुशी थी चेहरे पे और परिवार में भी बेहद सुकून का माहौल मगर कब तक पता नहीं । फिर जो हुआ वो आश्चर्यजनक था ,शाम को बिल्ला महाराज वही उसी कोने में इन्वर्टर पर विराजमान थे । मानो जैसे कुछ हुआ ही नहीं मैं हूँ वहीं मैं था जहाँ । और पूरा परिवार अब इस बिल्ले की विरासत को स्वीकार कर बैठा है । मस्त खान-पान और रहन-सहन का समुचित प्रबंध ह...

शांत क्यों हो सुशांत 😞

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चलिए सुशांत जी , आपको आपकी याद दिलाते है अब जो हकीकत है उसे ही आईना दिखाते है  पवित्र रिश्ता से आप टेलीविजन पर नजर आते है  सिर्फ अंकिता जी के ही नहीं सबके दिल में बस जाते है  सफर यहीं नहीं रुकता आपका आप तो बहूत आगे तक जाते है  टेलीविजन से निकलकर पर्दे पर आते है और काई पो चे चिल्लाते है PK में चार कदम बस चार कदम  चल दो ना साथ मेरे गाते है  जिस माही ने क्रिकेट से सबका दिल जीत लिया  उनकी Untold Story आप सबको सुनाते है  फिर बड़ी कठिनाई से केदारनाथ जाते है  खैरियत पूछो कभी तो कैफियत पूछो ऐसे गाने के अल्फाज गुनगुनाते है  तब सहसा शांत से रहने वाले सुशांत  छिछोरे बन जाते है  इतने सारे किरदार  बड़ी ही आसानी से निभाते है  सबको Impression का पाठ पढ़ाने वाले खुद Depression में चले जाते है  क्या हुआ जो जिन्दगी से ऊब जाते है  हमें रुलाकर सब कुछ भुलाकर खुद वक़्त से पहले बेवक़्त लटक जाते है  आप कहाँ यूँ हमें छोड़ जाते है  लौट आइए की आप बहूत याद आते है  जब तक ............ 😭😭😭😭 हाँ मेरे साथ तुम रहो ........😭😭😭😭😭 जाने की बात ना करो ...... 😪😔😭😭😭😭 🌱SwAsh🌳 @shabdon_ke_ashish ✍️

कहाँ गया वो पेड़ 🌳

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दोपहर का वक़्त था ,सूरज देवता एकदम बीचोबीच विराजमान थे और आसमान से आग बरस रही थी । एक राहगीर धधकती सड़क पर किसी अनजान मंजिल की तलाश में सफर कर रहा था । मंजिल का तो पता नहीं फ़िलहाल नजरों को एक छांव की ललक थी । तभी मानों अरसों की तलब पूरी हो गई और थोड़ी दूर सही पर एक विशालकाय बरगद का वृक्ष दिखाई पड़ा । फिर तो रेंगते कदमों में मानों सुनहरे पंख लग गए । उड़ता हुआ वो पथिक सीधा पेड़ के आगोश में जा गिरा । पसीने से लथपथ अपनी कमीज उतारी और तालाब में बैठी किसी भैंस या फिर नाली में पड़े किसी कुत्ते की तरह हांफने लगा । थोड़ी देर में ही उसने राहत की साँस ली और मंद-मंद पवनों की थपकी ने कब उसे झपकी के हवाले कर दिया पता ही नहीं चला । थका-हारा यायावर थोड़ी ही देर में गहरी नींद में सो गया । पर अचानक से उसका बदन फिर से जलने लगा और आँख खुली तो ना पेड़ था ना छांव ना दूर-दूर तक कोई शहर ना कोई गाँव । बेचैनी में वो उठ खड़ा हुआ और सोचने लगा कि ये एक सपना है या फिर वो कोई ख़्वाब था । कुछ देर तक आसमान निहारने के बाद वो फिर उसी अनजान सफर पर निकल पड़ा जिसकी ना तो कोई मंजिल थी ना ठिकाना ,आख़िर जेठ सी भरी दोपहरी में दिवाकर से आँख ...

आख़िर पहुँच ही गई शहर की गर्मी गाँव तक भी 🥵

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अगर आपको लगता है कि विकास गाँव तक नहीं पहुंचा तो शायद आपने गाँव को तब और अब देखा ही नहीं । वो धूल से सनी कच्ची सड़क अब चमचमाती अलकतरे की काली नागिन के दोनों तरफ सफेद पट्टी के निशान में तब्दील हो गई है । वो बरसात में कीचड़ से संघर्ष करते रास्ते अब झमाझम में नहा कर अपने कायाकल्प पर इतराते नजर आते है । वो लालटेन की धीमी रौशनी में दरवाजे के पीछे से अपने पति के आने की राह देखती चुन्नू-मुन्नू की माँ के घर से शहर तक दूधिया रौशनी में नहाती जमीं अब उस आसमां के चाँद के भरोसे नहीं जो पूरनमासी को पूरा और अमावस को नदारद हुआ करता था । ना तो पहले की तरह झोपड़ी है ना फुस के छप्पर , ना मिट्टी की दीवारें ना टाली ना चौबारें । अब देहात में भी किसी के हाथ झुलाने वाले पंखें के भरोसे नहीं , सर पे नाचता है तीन टांगों वाला खेतान या तूफ़ान । कभी जिन्हें गुरूर हुआ करता था प्रकृति की ताजी हवा पर आजकल समृद्धि के एयरकंडीशन के सुरूर में मगरूर है ।                        अब शहरी साहब और उनके परिवार को जब शहर जलाता है तो कहां वो ख्वाबों का गाँव याद आता है । मकान तो दोनों जगह पक्के है मगर फिर भी गर्मी से परेशान बच्चे है । ...

खौफ़ की एक रात 🙄

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कल रात चाँद रक्त सा लाल था मानों चाँदनी ने लहू पी लिया हो और अपनी सारी लाली चमकते चाँद पर उड़ेल दी हो । आम लोगों के लिए तो ये बस एक सामान्य सी बात थी , सच कहूँ तो अधिकांश ने ध्यान ही कहाँ दिया आसमान पे । पर जिसने दिया वो चश्मदीद है अंधेरी रात में अंगारों से दहकते रक्ताभ चाँद का ।     रोजाना की तरह मैं तक़रीबन 8.45 के आस-पास अपने घर की सीढ़ियों पर टहलता हुआ छत पे खुले आसमान के नीचे राहत की साँस की चाह में सुकून के पल बिताने पहुँचा । नीचे तो मानो आग बरस रही थी अब किसे पता था कि धरती की तपिश से चाँद भी लाल हो जायेगा , भाई वाह इश्क़ हो तो ऐसा । वैसे तो मैं आदत से मजबूर अक्सर उत्तर-पूर्व के आसमान को निहारता रहता हूँ पर जैसे ही मेरी नजर दक्षिणपूर्वी कोने पे पड़ी पेड़ की छाया से थोड़ा ही ऊपर चाँद जलते तवे पे पड़े लाल गुड़ के पराठे सा धधक रहा था ,पर इस तपन में भी अखंड ठंडक थी बस नजरें इस दृश्य को देखकर उबलने लगी और मन मस्तिष्क से भी तेज कुछ तलाशने लगा ।  अभी हम इस उधेड़-बुन में ही व्यस्त थे कि अचानक रेड ब्लड मून का ख्याल आया और मेरे छत की जमीन पर टहलते तन्हा कदम एकदम से ठहर गए । क्योंकि ये तो क़यामत की र...

तू हवा है या जिन्दगी 🌳

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कभी पछुआ जोर लगाती है  तो कभी पुरवा शोर मचाती है  जिन्दगी का मतलब बहना है  ये पाठ हमें सिखलाती है  ख़ामोश हो जाना है सबको एक दिन इस मौन से ये कब घबराती है  कभी सर्दी में ठिठुराती है  तो कहीं गर्मी से जलाती है  कभी चल-चल के सताती है  तो कभी ना चले तो रुलाती है  किसी सुबह ख्बाब से जगाती है तो किसी शाम को दिल बहलाती है  कभी तन्हाई में सिसकाती है तो कभी महफ़िल में आग लगाती है  कभी बादल संग रेस मचाती है  तो कभी बारिश में नहाती है  कभी सूरज को आँख दिखाती है  तो कभी चंदा में शर्माती है  कभी अधरों पे फड़फड़ाती है  तो कभी सीने में आह दबाती है  कभी पायल बन झनझनाती है  तो किसी आँचल को लहराती है  कभी आशिक़ को मचलाती है  तो कभी शायर के शब्द सजाती है  कभी सजे हुए को बिखराती है  तो कभी किसी बिखरे को सजाती है कभी कोरे कागज पे कोई किस्सा बन जाती है  तो कभी किसी किस्से को ही कोरा कर जाती है  कभी तितली के संग रंग लाती है  तो कहीं जुगनुओं में जगमगाती है  कभी चिड़ियों संग चहचहाती है  तो किसी झरने के संग गाती है  कभी जुल्फों को सहलाती है  तो कभी गालों को छू जाती है  कोई संदेश कहीं ले जाती है  तो कभी याद किसी की ल...

वो एक दिन और उनका जन्मदिन 🦋

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वैसे तो हर एक दिन विशेष होता है और प्रत्येक पल की अपनी विशेषता होती है पर कुछ तो बेहद खास बात है ना इस 19 मई की जिसका इंतजार सादगी भी बड़ी बेसब्री से करती है ,मगर कभी इज़हार नहीं करती ये अलग बात है । वैसे भी उनकी जुबां अंतरों से सजी अन्तराक्षरी है व गीतों का सुरीला चित्रहार है जो अक़्सर अपनी भावनाओं की नदी को नगमों के झरनों में परोसती है । है ना बेहद दिलचस्प ,मुझसे बेहतर ये कौन जान सकता है भला !          ऐसा नहीं है कि उन्हें खुशियाँ तलाशनी पड़ती है दरअसल सच तो ये है कि हसीं पल उन्हें खुद ढूँढ़ लेते है । पर जन्मदिन तो साल में एक बार ही आता है ना वो भी बस 24 घण्टे के लिए फिर जो पूरे साल की सेलेब्रिटी है उसे इस स्पेशल डे पर रॉयल्टी मिलना तो लाज़िमी है । कहाँ उन्हें फुरसत है कहीं आने-जाने की वो तो एक कमरे की संसद भवन में पाँच साल के सरकारी कार्यकाल की तरह खाली है या फिर इतनी व्यस्त की बाहर की दुनिया के लिए वक़्त ही नहीं । फिर भी कभी जब विधाता की असीम अनुकंपा से भ्रमण का संयोग बनता है और वो अवसर आता है जब तमाम सियासत छोड़कर महारानी उस देशी रियासत की फिजाओं में अपने क़दम रखती है जहाँ के कण-कण मानों ...

हाय ये सफर ;उफ़्फ़ वो यादें ✍️☕✍️

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रोज सुबह आपको इत्मिनान से पीने को चैन वाली चाय मिले ये जरूरी नहीं । वक़्त एवं हालात के हिसाब से उस दिलचस्प स्वाद के साथ हसीं यादों को दिए जाने वाले समय से समझौता करना पड़ता है , नहीं तो अगर फिर से उन लम्हों के दामन में खोये तो कहीं देर ना हो जाये ।  आज तड़के सुबह मुझे पूरब वाली झरोखे से आते हवा के झोखे ने सूरज निकलने से पहले ही जगा दिया परंतु खुली आँखों के साथ जुबान को तड़का लगाने वाली उस स्वाद मेरा मतलब उस चाय की ऊर्जावान ख़ुराक के लिए समय पर्याप्त नहीं था , दिन भर का सफर जो शुरू होने वाला था । पहले पटना और फिर वहाँ से गया के लिए । फिर भी इस आनन-फानन में भी झटपट दो-चार घूँट तो लगा ही ली मैंने । यूँ तो मैं चाय का आदी नहीं हूँ पर मौसम का मिजाज और लेखक वाले अंदाज के लिए एक प्रबुद्ध अवसरवादी की तरह चुस्किया  लेता हूँ । आख़िर इस प्याली से मेरे ख़्वाब और ख़्याल जो जुड़े है पर मैं सुरमा भोपाली की तरह सिर्फ ख़्याली भी नहीं , मुझे काम भी करना होता है ,जी हाँ पढ़ने-लिखने के अलावा भी ।        तैयार होते ही माँ दो आलू पराठे और दही लेकर आई और मैंने भी इन्हें निपटाने में देर कहाँ लगाई । भागते हुए एक भले...

हवा बदलते देर नहीं लगती 🌬️

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अभी दो दिन पहले की ही तो बात है आसमान से आग बरस रही थी ,पछुआ हवा ने आतंक मचा रखा था , घर का कण-कण दहक रहा था ; मानो किसी भट्टी में पड़े हम दिन के पहर गिन रहे थे और आज सुबह चादर में लिपटे गुलाबी ख़्वाब देख रहे है । बदल गया ना सबकुछ सच ही तो कहते है कि हवा बदलते देर नहीं लगती । हवाओं का ही तो असर है कि दरवाजों की ओट में पड़े लोग आज खिड़कियाँ खोल कर मौसम का मजा ले रहे ।      आलम ये था कि सवेरा होते ही दोपहर हो जाती थी और फिर शाम तक लहर का कहर । आधी रात के बात थोड़ा सुकून जरूर मिलता था मगर आँख लगते ही पता नहीं कब फिर से सूरज चढ़ा होता था क्षितिज में ।              परसो से हवा का रूख बदला और चीखती गरजती पछुआ का स्थान सरसराती सर्द पुरवा ने ले लिया । रफ्ता-रफ्ता धरती की तपती रूह शीतल हो गई और आहिस्ता-आहिस्ता हमारी धधकती साँसें भी ।          अभी हम इस ओह-पोह में ही थे कि मई की गर्मी के बीच ये चादर में लिपटी सुबह कैसे नशीब हो गई तभी पुरवईया पूरब से पैगाम लेकर आई कि कल शाम बरसात हुई थी पूर्वी रियासत के आँगन में । ये बात भी तो सोलह आने सच है कि पश्चिम के लिए राहत हमेशा पूरब से ही आती है । कल रात जब ये ...