वक़्त बदलता नहीं , वक़्त को बदलना पड़ता है ।
हमने अक्सर सुना है कि वक़्त की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि चाहे जैसा भी हो गुजर जाता है ; हम बहती हुई दरिया की किसी बूंद को दोबारा नहीं छू सकते । जिस पल में जी रहे है वो पल लौट कर नहीं आयेगा। पर क्या वाकई वक़्त बदलता है या वक़्त को बदलना पड़ता है । इस सवाल के दो आयाम है एक ये कि जीवन को वक़्त के भरोसे छोड़ दे और वक़्त अपने हिसाब से चलता रहे और दूसरा ये कि वक़्त को अपने अनुसार बनाने के लिए निरंतर प्रयास जारी रखा जाए । अब जरा सोचिए वक़्त तो हर हाल में बदलेगा पर आपने इसे अपने अनुरूप बदलने के लिए किया क्या है ?
" वक़्त एक नदी है जो बहती जा रही है , दिशा और दशा तय करेगी सागर तक का सफर "
इतिहास के पन्नों को पलटने पर हम पाते है कि जिसने भी जीवन के उद्देश्य को समझकर लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया उसने इस समय के पहिए को अपने हिसाब से घुमाया या फिर इस पहिए की रफ्तार को पहचान कर उसके ताल से ताल मिलाकर चलता चला गया । और वो लोग जो नियति के भरोसे बैठे रह गए ये सोचकर कि उनका समय आयेगा दरअसल वो समय कभी आया ही नहीं क्योंकि समय बदलता जरूर है मगर उनके लिए नहीं जो जीवन के किसी मोड़ पर ठहरे रह जाते है । अगर चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य की जोड़ी ने घनानंद को परास्त करने के लिए योजना नहीं बनाई होती तो आज मौर्य वंश का गौरवशाली इतिहास होता क्या ? सिकंदर की सेना अगर एक नदी की धारा को पार करने में अपनी असमर्थता ना जताई होती तो आज इतिहास में एक विश्वविजेता का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित होता । मुगल जैसे शक्तिशाली और विशाल साम्राज्य का पतन हो गया , लगभग तीन सौ सालों के मजबूत औपनिवेशिक शासन का अंत हो गया और 75 वर्षों तक भारत पर राज करने वाली एक राष्ट्रीय पार्टी आज क्षेत्रीय पार्टियों से भी कद-काठी में कम हो गई है । अतः स्पष्ट है कि वक़्त तो बदला पर उसके हिसाब से ही जिसने इसके लिए अथक परिश्रम किया और जो निश्चिंत होकर ये मान लिया कि वक़्त तो मेरी मुठ्ठी में है आखिरकार वक़्त उसकी हथेली से फिसलता चला गया ।
" वक़्त ने इतिहास रचा भी है और इसे बदला भी है "
विद्यार्थी जीवन में समय की महता तो सदा से ही रही है , अगर एक छात्र जीवन पर प्रकाश डाला जाए तो इसके लिए समय ही धन है । प्रतियोगिता के इस दौर में हम सभी एक रेस में भागे जा रहे है और हर दिन एक जमात इस अनवरत दौड़ का हिस्सा बनते जा रही है , पर अंततः सफलता उसी को प्राप्त होती है जो समय के साथ चलता है सच कहे तो समय के हिसाब से खुद को बदलता है या फिर समय को अपने अनुसार । पल , मिनट , घंटे , दिन , महीने , साल सभी के लिए एक समान है तथा धरती अपनी नीयत चाल से वर्षों से चलते आ रही है पर क्या इस सीमित समय में असीमित मुक़ाम को हासिल किया जा सकता है ? जी बिल्कुल अगर कार्यों को योजनागत तरीके से अंजाम दिया जाए । कहते है ना कि परिश्रम व्यर्थ नहीं जाता पर यदि दिशा सही ना हो तो मंज़िल तक पहुंचने में वक़्त जरूर ज्यादा लग जाता है । अगर कोई अभ्यर्थी अल्प समय में सफल हुआ है तो निश्चय ही उसकी योजना तथा कार्य पद्धति अन्य लोगों से उन्नत रही होगी और वक़्त को पहचानने का उसका नज़रिया बाकियों से बेहतर रहा होगा । स्पष्ट है कि वक़्त बड़ी आसानी से बदल जाता है पर वक़्त को बदलने के लिए संघर्ष करना पड़ता है ।
" समय से ज्यादा सामर्थ्य किसी में नहीं पर जो सामर्थ्यवान है समय भी उसका दास है "
नारियों की दशा में उतार-चढ़ाव से भला कौन वाक़िफ नहीं है । ऋग्वैदिक काल से उत्तरवैदिक आते- आते तो मानों सामाजिक संरचना ही बदल गई थी और तब से लेकर अब तक कहीं ना कहीं वो पुरुष प्रधान मानसिकता आज भी जीवित है । पर ऐसा नहीं है कि जैसा था वैसा ही रह गया । समय के साथ और विभिन्न कालों में इसमें सुधार अवश्य हुए जिसका सबसे बेहतर उदाहरण सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन का युग है जब हमारे विभिन्न समाज सुधारकों ने अपने अथक प्रयास से सामाजिक एवं धार्मिक कुरीतियों तथा आडंबरों पर प्रतिबंध लगाने का सफल प्रयास किया । बाल विवाह , सती प्रथा , स्त्री शिक्षा , विधवा विवाह आदि इसके प्रमुख उदाहरण है । वक़्त के साथ समाज की मानसिकता में गुणात्मक सुधार हुए है तथा आज महिलाएं जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विश्व के विकास में अपनी प्रतिभा और कौशलता का योगदान दे रही है । ये क्रमिक बदलाव इस बात का प्रमाण है कि वक़्त बदलता नहीं , इसे बदलना पड़ता है ।
" वक़्त तो बदलना ही था आख़िर कब तक वो पर्दे में रहती भला , आज आजाद है वो अनंत तक फैले इस नील गगन में अपने पंख फड़फड़ाने के लिए "
हमारा देश भारत कभी सोने की चिड़िया था और हमारी विविधता से भरी समृद्ध विरासत पूरे विश्व के लिए एक मिशाल थी , दरअसल हमारी सभ्यता और संस्कृति की उत्कृष्टता ने हमें विश्वगुरु का दर्जा दे रखा था । पर बारंबार आक्रांताओं द्वारा बर्बरता से लूटे जाने के कारण और मुगलों तथा औपनिवेशिक मानसिकता से शोषित एवं शासित होने के उपरांत हमारी वैश्विक पहचान धूमिल हो गई । पर एक लंबे संघर्ष के बाद जब 1947 में 15 अगस्त की सुबह हमने आजादी का सूरज देखा तब से हमने पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा और निरंतर विकास के नए आयाम प्राप्त करते गए । जब हमें स्वाधीनता प्राप्त हुई तब हमारे समक्ष दो सबसे बड़ी चुनौतियां थी एक भूखी जनता का पेट भरना और दूसरा अशिक्षित आवाम को साक्षर बनाना । हमारी दूरदर्शिता ने हमें आज उत्पादन में आत्मनिर्भर ही नहीं निर्यातक की श्रेणी में ला कर खड़ा कर दिया है और शिक्षा के क्षेत्र में भी गुणात्मक सुधार हुए है । इस प्रकार देखा जाए तो बदले हुए वक़्त को भी हमने अपनी नीतियों से बदलकर रख दिया है तभी तो दुनिया के तमाम देश आज हमारी तरफ आशा भरी नजरों से देख रहे है और हम एक बार फिर विश्वगुरु बनने जा रहे है साथ ही साथ संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारा बढ़ता कद हमारी शक्ति और सामर्थ्य का भी परिचायक है ।
" इतिहास गवाह है कि हम विश्वगुरु थे और वर्तमान साक्षी है कि हम एक बार फिर जगतगुरू बनने जा रहे है "
वैश्विक परिदृश्य में देखे तो कभी विश्व में दो शक्तियों का बोलबाला था जिनके बीच वर्षों तक चले शीत युद्ध ने पूरी दुनिया को दो धुरी में बांटे रखा । पर आज परिस्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी है और आधिपत्य एवं औपनिवेशिक सोच ने रफ्ता-रफ्ता दम तोड़ दिया है तभी तो छोटे और अल्पविकसित देश भी अपनी तकनीक और प्रौद्योगिकी के दम पर विकसित राष्ट्रों के साथ कदम बढ़ाते नजर आ रहे है । जिस परमाणु शक्ति का भय दिखाकर दुनिया पे कब्जा करने का ख्वाब पाला जा रहा था वो अब बस एक हथियार मात्र रह गई है । मगर फिर भी विकसित और अविकसित राष्ट्रों के बीच फर्क आज भी है क्योंकि वक़्त बदलने के प्रयास में काफी भिन्नता है ।
" वक़्त तो सबके लिए एक समान है , इसे अपने अनुरूप बनाना आपका काम है "
आर्थिक , राजनीतिक , सामाजिक , शैक्षणिक , रक्षा , व्यापार , शासन , प्रशासन सभी क्षेत्रों में वक़्त के अनुसार बदलाव आए परंतु उसी ने अपनी पहचान बनाई जिसके पास वक़्त को बदलने का तजुर्बा था , पुरुष से महापुरुष बनने में वक़्त तो लगता है ना पर एक बार अगर आपने वक़्त की नज़ाकत को पहचान लिया ना फिर वक़्त बदलते देर नहीं लगती ।
" चलो हर रोज बस एक कदम ही सही चलते है , जो ठहरा हुआ है कहीं कब से उस वक़्त को बदलते है "
आशीष ✍️

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