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कर्तव्य पथ

कर्तव्य पथ पर घना कोहरा है  दूर तक पसरी धुंध है  पर कैसे चलूं मैं  इन आंखों को मूंद के रात का अंधेरा  छंट चुका कबका मगर गुम है  ओस की चादर में सूरज की लाली सड़क मैदान  खेत खलिहान  सब लगते है खाली आसमां से जमीं तक  हर ओर नमी है  आलस हावी है मस्तिष्क पे बस शायद एक कदम बढ़ाने की कमी है  उधर लोगों को रजाई की नरमी ने जकड़ रखा है  इधर ट्रेन की धीमी रफ्तार ने जीवन की चाल को पकड़ रखा है  कोई चम्मच में चिपके च्यवनप्राश को चाट रहा है  तो कोई चाय की हसीं चुस्कियों की राह ताक रहा है  किसी को नहाने से परहेज है  तो किसी की बस सोच कर ही धड़कने तेज है  फिर भी जिसे निकलना है नित्य कर्तव्य पथ पर  उसके लिए क्या आग की दरिया और क्या ये सर्द हवा  लिखने को अपनी दास्तां  लो सफ़र शुरू हो गया  ये माना कि  कर्तव्य पथ पर घना कोहरा है  दूर तक पसरी धुंध है  पर कैसे चलूं मैं  इन आंखों को मूंद के ..... 🌱SwAsh💚 @shabdon_ke_ashish✍️