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Showing posts from January, 2026

मैंने अब खुद के लिए पढ़ना छोड़ दिया है ✍️

मैंने अब खुद के लिए पढ़ना छोड़ दिया है जीवन ने जैसे कोई नया मोड़ लिया है उन परम्परागत अकबर , बाबर और अशोक के किस्सों से नाता तोड़ लिया है अब चंद ख्वाबों को ही जो टूट रहे है गुजरते वक़्त के साथ किताबों से जोड़ दिया है माना कि मेरी जीत से आप परिचित नहीं मगर मैं हारा नहीं हूँ वो मंजिल मिली ना सही पर मैं कोई आवारा नहीं हूँ आसमान से बिछड़ा जरूर हूँ किंतु टूटा हुआ तारा नहीं हूँ करवटें बदलता रहा है मेरा सफ़र नजारें बदल गए है मगर बदली ना नज़र मैं हर उस मैं के साथ हूँ जिसके भीतर हम बनने वाली बात है जो भी मिला है फुरसत से मुझसे किसी डगर उसके दिलों दिमाग पर जरूर है मेरी बातों का असर शांत है विशाल इतना मानों प्रशांत है मेरे अनुभवों का समंदर सबको कहां समझ आएगी ये उफनती लहर आज भी मेरा धैर्य उस दरिया की दृढ़ प्रतिज्ञा के समान है जिसने सागर से मिलने को लगा दी अपनी जान है सूरज सा संकल्प है जिसे रोज निकलना है चांद सा विकल्प है जितनी मिले रौशनी उसी से चमकना है इस अखंड शांति की तलाश ने भी जमाने को एक शोर दिया है अध्यात्म की अनुभूति ने आत्म पहचान पर जोर दिया है मैंने अब खुद के लिए पढ़ना छोड़ दिया है जीवन ने...

“उत्कृष्ट कला अनुभव को प्रदर्शित करती है और सत्य को उद्घाटित करती है”

            मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आयाम उसका अनुभव है। अनुभव ही वह तत्व है जो मनुष्य को साधारण जीवों से अलग करता है, क्योंकि अनुभव ही भावनाओं, कल्पना और चिंतन को जन्म देता है। कला इन्हीं अनुभवों की मूर्त अभिव्यक्ति है। जब मनुष्य अपने अनुभवों, संवेदनाओं और विचारों को किसी दृश्य, श्रव्य या साहित्यिक रूप में व्यक्त करता है, तो वह कला बन जाती है। इस कला की उत्कृष्टता इस बात में होती है कि वह किस हद तक मानवीय अनुभव की गहराई को प्रस्तुत कर सके, और किस सीमा तक वह जीवन के सत्य को उद्घाटित कर सके। इसीलिए कहा गया है कि श्रेष्ठ कला केवल सुंदरता नहीं रचती, बल्कि सत्य का साक्षात्कार कराती है।     कला की उत्पत्ति वस्तुतः मनुष्य के भीतर से होती है। जब व्यक्ति किसी गहन अनुभूति से गुजरता है—चाहे वह आनंद की हो या दुःख की, प्रेम की हो या विरक्ति की—वह इसे किसी रचनात्मक रूप में व्यक्त करने की प्रेरणा प्राप्त करता है। यह प्रेरणा ही कला के जन्म का आधार है। इस दृष्टि से कला मानवीय अनुभव की भाषा है। वह उन जटिल भावनाओं को भी व्यक्त कर देती है जिन्हें शब्दों में कहना कठिन होता है। उदाहरण के लिए, एक च...

“विचार ही जीवन का आधार है, विचारहीन मानव पशु के समान है”

  मनुष्य केवल शरीर या संवेदना का पुतला नहीं, बल्कि एक विचारशील सत्ता है। उसके भीतर विचार करने, तर्क करने, और निर्णय लेने की जो अद्भुत क्षमता है, वही उसे बाकी जीव-जंतुओं से अलग करती है। यही विचार शक्ति मानव जीवन का वास्तविक आधार है। यदि इस विचार शक्ति को मनुष्य खो दे या उसका उपयोग न करे, तो वह बाहरी रूप से भले ही मनुष्य दिखाई दे, परंतु भीतर से पशु के समान जीवन जीने लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि विचार ही वह शक्ति है जो मानव को अच्छाई और बुराई, सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय में भेद करने की क्षमता प्रदान करती है। विचार ही जीवन की दिशा तय करता है। यह मनुष्य के कर्म, व्यवहार और नैतिकता का मूल स्रोत है। जिस दिन मनुष्य सोचना बंद कर दे, उस दिन उसकी मानवता भी समाप्त हो जाती है।       विचार का अर्थ केवल मन में कुछ कल्पना करना नहीं है, बल्कि यह बौद्धिक और नैतिक विवेक का संयोजन है। विचार मनुष्य को आत्मचिंतन, आत्मविश्लेषण और आत्मसंवेदन की दिशा देता है। जब कोई व्यक्ति परिस्थितियों को समझकर, तर्क और अनुभव के आधार पर निर्णय करता है, तब उसका जीवन जागृत और सचेत कहा जा सकता है। इसके विपरीत जब वह सोचने-समझने...

कर्तव्य पथ

कर्तव्य पथ पर घना कोहरा है  दूर तक पसरी धुंध है  पर कैसे चलूं मैं  इन आंखों को मूंद के रात का अंधेरा  छंट चुका कबका मगर गुम है  ओस की चादर में सूरज की लाली सड़क मैदान  खेत खलिहान  सब लगते है खाली आसमां से जमीं तक  हर ओर नमी है  आलस हावी है मस्तिष्क पे बस शायद एक कदम बढ़ाने की कमी है  उधर लोगों को रजाई की नरमी ने जकड़ रखा है  इधर ट्रेन की धीमी रफ्तार ने जीवन की चाल को पकड़ रखा है  कोई चम्मच में चिपके च्यवनप्राश को चाट रहा है  तो कोई चाय की हसीं चुस्कियों की राह ताक रहा है  किसी को नहाने से परहेज है  तो किसी की बस सोच कर ही धड़कने तेज है  फिर भी जिसे निकलना है नित्य कर्तव्य पथ पर  उसके लिए क्या आग की दरिया और क्या ये सर्द हवा  लिखने को अपनी दास्तां  लो सफ़र शुरू हो गया  ये माना कि  कर्तव्य पथ पर घना कोहरा है  दूर तक पसरी धुंध है  पर कैसे चलूं मैं  इन आंखों को मूंद के ..... 🌱SwAsh💚 @shabdon_ke_ashish✍️