“विचार ही जीवन का आधार है, विचारहीन मानव पशु के समान है”
मनुष्य केवल शरीर या संवेदना का पुतला नहीं, बल्कि एक विचारशील सत्ता है। उसके भीतर विचार करने, तर्क करने, और निर्णय लेने की जो अद्भुत क्षमता है, वही उसे बाकी जीव-जंतुओं से अलग करती है। यही विचार शक्ति मानव जीवन का वास्तविक आधार है। यदि इस विचार शक्ति को मनुष्य खो दे या उसका उपयोग न करे, तो वह बाहरी रूप से भले ही मनुष्य दिखाई दे, परंतु भीतर से पशु के समान जीवन जीने लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि विचार ही वह शक्ति है जो मानव को अच्छाई और बुराई, सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय में भेद करने की क्षमता प्रदान करती है। विचार ही जीवन की दिशा तय करता है। यह मनुष्य के कर्म, व्यवहार और नैतिकता का मूल स्रोत है। जिस दिन मनुष्य सोचना बंद कर दे, उस दिन उसकी मानवता भी समाप्त हो जाती है।
विचार का अर्थ केवल मन में कुछ कल्पना करना नहीं है, बल्कि यह बौद्धिक और नैतिक विवेक का संयोजन है। विचार मनुष्य को आत्मचिंतन, आत्मविश्लेषण और आत्मसंवेदन की दिशा देता है। जब कोई व्यक्ति परिस्थितियों को समझकर, तर्क और अनुभव के आधार पर निर्णय करता है, तब उसका जीवन जागृत और सचेत कहा जा सकता है। इसके विपरीत जब वह सोचने-समझने के बिना केवल प्रवृत्तियों और इच्छाओं के अधीन होकर कार्य करता है, तब उसका जीवन पशुवत बन जाता है। पशु भी भोजन, भय, और प्रजनन की प्रवृत्तियों के अधीन होते हैं; किंतु उनमें सही और गलत का भेद करने का सामर्थ्य नहीं होता। यही सामर्थ्य विचार के कारण मनुष्य में उत्पन्न होती है, और इसी से वह वास्तव में ‘मानव’ कहलाने का अधिकारी बनता है।
इतिहास बताता है कि जब-जब मनुष्य ने अपनी विचार शक्ति का जागरूक उपयोग किया है, तब-तब उसने सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक प्रगति की नई ऊँचाइयाँ छुई हैं। जब भगवान बुद्ध ने करुणा, मध्यम मार्ग और अहिंसा का विचार दिया, तो उस विचार ने एक स्थायी नैतिक क्रांति की नींव रखी। जब स्वामी विवेकानंद ने मनुष्य को ‘उठो, जागो’ कहकर विचार करने और आत्मबल पहचानने की प्रेरणा दी, तब भारत के युवा वर्ग में नवजागरण की लहर उठी। जब महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के विचार को राजनीतिक आंदोलन का आधार बनाया, तब उन्होंने बिना हिंसा के साम्राज्य को हिला दिया। गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं, एक विचार थे। इसी प्रकार सुकरात, प्लेटो, अरस्तू जैसे दार्शनिकों ने तर्क और विचारशीलता के माध्यम से मानव सभ्यता के पथ को आलोकित किया। यदि इन महापुरुषों ने विचार न किया होता, तो संभवतः हम आज सभ्य समाज के स्थान पर अंधकारमय युग में जी रहे होते। अतः कहा जा सकता है कि सभ्यता का इतिहास मूलतः विचारों का इतिहास है।
विचारशीलता मनुष्य को न केवल प्रगति की दिशा देती है, बल्कि उसे नैतिकता और आत्मसंयम के मार्ग पर भी चलना सिखाती है। विचारयुक्त व्यक्ति केवल व्यक्तिगत हित नहीं देखता, बल्कि समाज, राष्ट्र और मानवता के व्यापक हित का विचार करता है। इसलिए उसका कर्म विवेकपूर्ण और संतुलित होता है। वही मनुष्य न्यायप्रिय होता है जो विचारशील होता है। विचारकील व्यक्ति दूसरों की पीड़ा को समझ सकता है, क्योंकि उसमें सहानुभूति भी विचार का ही विस्तार है। इसके विपरीत, विचारहीन व्यक्ति केवल तत्कालिक लाभ, भावनाओं या आवेगों के अनुसार क्रिया करता है। उसका जीवन क्षणिक इच्छाओं और प्रतिक्रियाओं से संचालित होता है। वह बिना सोचे कार्य करता है, जिससे समाज में अशांति, हिंसा और अराजकता बढ़ती है। इतिहास में अनेक बार विचारहीनता मनुष्य को विनाश की ओर ले गई है। हिटलर के शासनकाल में लाखों लोगों की हत्या केवल एक व्यक्ति की विचारहीन महत्वाकांक्षा और समाज की असंवेदनशील आज्ञाकारिता का परिणाम थी। जब समाज मिलकर विचार बंद कर देता है, तो भीड़ बन जाता है — और भीड़ का कोई विवेक नहीं होता। भीड़ केवल उन्माद और हिंसा जानती है, विचार नहीं।
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में विचार को अत्यंत उच्च स्थान दिया गया है। भारत के ऋषियों और दार्शनिकों ने सदा कहा कि मनुष्य तभी मनुष्य है जब वह विचार करता है। उपनिषदों में कहा गया — “मनसा चिंतनं कृत्वा कर्माणि कुर्वीत।” अर्थात पहले विचार करो, फिर कर्म करो। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अंध आज्ञाकारिता नहीं, बल्कि विचारपूर्वक निर्णय का आदेश दिया। उन्होंने कहा— “स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः।” यानी जो विचार कर अपने कर्म का निर्धारण करता है, वही श्रेष्ठ होता है। बुद्ध भी कहते थे— “अप्प दीपो भव” अर्थात अपने विचार से स्वयं ही अपने लिए दीपक बनो। इन सभी शिक्षाओं का सार यही है कि विचार ही मनुष्य के जीवन का प्रकाश है। बिना विचार के जीवन अंधकारमय है ।
विचारशीलता केवल दर्शन या धर्म का विषय नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन की आवश्यकता है। परिवार, समाज, व्यापार या राजनीति – हर क्षेत्र में विचार ही आधार है। एक शिक्षक जब विद्यार्थियों के भविष्य के बारे में सोचता है, एक किसान जब उत्पादन की योजना बनाता है, एक वैज्ञानिक जब खोज करता है, या एक प्रशासनिक अधिकारी जब नीति बनाता है — वे सभी विचार के माध्यम से ही समाज को आगे बढ़ा रहे होते हैं। विचारहीनता का परिणाम हर क्षेत्र में पतन है। यदि शिक्षा केवल रटने तक सीमित हो जाए, तो ज्ञान नहीं टिकता; यदि शासन विचारहीन होकर केवल सत्ता का उपकरण बन जाए, तो लोकतंत्र नष्ट हो जाता है; यदि मनुष्य सोचने के बजाय केवल भोग में डूब जाए, तो वह आत्मा से पंगु हो जाता है।
आज का युग तकनीकी और सूचना क्रांति का युग है। लेकिन सूचना और विचार दो अलग चीजें हैं। सूचना हमें तथ्य देती है, विचार हमें दिशा देता है। आज अधिकतर लोग जानकारी से संपन्न हैं, परंतु विचार से रिक्त हैं। सोशल मीडिया के दौर में प्रतिक्रिया तुरंत होती है, पर चिंतन विलुप्त। लोग सोचने से पहले बोलने लगे हैं, सुनने से पहले निर्णय लेने लगे हैं। यह विचारहीनता का आधुनिक रूप है, जो लोकतंत्र और समाज के लिए घातक है। जब नागरिक विवेक खो देता है, तब वह प्रचार, अफवाह या समूह-भावना का शिकार बन जाता है। आज समाज में बढ़ती असहिष्णुता, नफरत और विभाजन उसी विचारहीन प्रवृत्ति का परिणाम है। इसलिए यह समय सबसे अधिक विचारशील नागरिकों की मांग करता है, जो तर्क से सोचें, प्रमाण से निर्णय लें, और मानवता के मूल्यों को आधार बनाएं।
विचार केवल बौद्धिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मिक साधना भी है। जब मनुष्य विचार करता है, तो वह केवल बाहरी दुनिया को नहीं, खुद को भी समझता है। विचार आत्ममंथन की प्रक्रिया है। यही कारण है कि बड़े विचारक प्रायः अकेलेपन और मौन में रमे रहते हैं। विचार मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है। वह अनुशासन, धैर्य और विवेक सिखाता है। महात्मा गांधी रोज़ आत्मचिंतन करते थे; स्वामी विवेकानंद ने आत्मविकास को विचार प्रवाह से जोड़ा। जिस मनुष्य के विचार जितने ऊँचे होते हैं, उसका जीवन उतना ही महान होता है। विचारों की ऊँचाई जीवन की ऊँचाई बन जाती है।
विचारशीलता का अभाव व्यक्ति को दूसरों के विचारों का गुलाम बना देता है। जो मनुष्य स्वयं नहीं सोचता, वह दूसरों की सोच से संचालित होता है। यही कारण है कि अधिनायकवादी व्यवस्थाएँ जनता से सबसे पहले उनकी सोचने की क्षमता छीन लेती हैं। जब लोग सोचते नहीं, तो वे प्रश्न नहीं करते; जब वे प्रश्न नहीं करते, तो वे विरोध नहीं करते; और जब वे विरोध नहीं करते, तो अत्याचार बढ़ता जाता है। इसलिए विचार स्वतंत्रता का सबसे बड़ा अस्त्र है। संविधान में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ केवल बोलने की छूट नहीं, बल्कि सोचने की स्वतंत्रता है। विचारशील समाज ही सजग लोकतंत्र का आधार है।
समाज की समरसता और सह-अस्तित्व भी विचार से ही संभव होता है। जब व्यक्ति विचार करता है, तभी वह दूसरों के दृष्टिकोण को समझने में सक्षम होता है। विचारशील व्यक्ति जानता है कि मतभेद स्वाभाविक हैं, इसलिए वह सहिष्णु बनता है। सहिष्णुता विचार का ही गुण है, अंधभक्ति का नहीं। विचारशील समाज में संवाद होता है, टकराव नहीं। आज के युग की हर समस्या का समाधान – चाहे वह साम्प्रदायिकता हो, पर्यावरण संकट हो या वैश्विक असमानता – विचार से ही निकल सकता है, क्योंकि हर नीति और हर परिवर्तन की जड़ में कोई न कोई विचार ही होता है।
विचार व्यक्ति और समाज दोनों के विकास का इंजन है। विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, राजनीति — हर क्षेत्र की अग्रगति वही कर सकता है जो सोचने का साहस रखता है। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत, आइंस्टीन ने सापेक्षता का विचार, कबीर ने धर्मनिरपेक्षता की भावना, और प्रेमचंद ने यथार्थवादी दृष्टिकोण – ये सब विचार ही थे जिन्होंने मानव सभ्यता के विचार–मानचित्र को बदला। विचारहीन समाज जड़ बन जाता है, जैसे रुका हुआ पानी सड़ जाता है। चलती हुई धारा ही जीवनदायिनी होती है। इसलिए विचारशीलता का सतत प्रवाह बनाए रखना जरूरी है।
मनुष्य के विकास के लिए केवल साधन, संसाधन या प्रौद्योगिकी पर्याप्त नहीं हैं। यदि उसमें विचार नहीं, तो वह विनाश का उपकरण बन सकते हैं। परमाणु ऊर्जा वैज्ञानिक बुद्धिमत्ता का परिणाम थी, लेकिन जब विचारहीन महत्वाकांक्षा ने इसे युद्ध का साधन बनाया, तो उसने लाखों जीवन नष्ट कर दिए। अतः तकनीकी प्रगति तभी सार्थक है जब उसके पीछे विचारशीलता हो। विचार ही वह नैतिक नियंत्रण है जो प्रगति को दिशा देता है। अन्यथा प्रगति पशुता में बदल सकती है।
विचारशील व्यक्ति का जीवन केवल बाहरी नहीं, आंतरिक अनुशासन से भरा होता है। वह दूसरों की नकल नहीं करता, बल्कि अपनी राह सोचो-समझो बनाता है। वह प्रश्न करता है, संशय करता है, और फिर स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुँचता है। ऐसा व्यक्ति सशक्त, आत्मनिर्भर और जिम्मेदार होता है। उसकी आत्मा जीवंत रहती है, क्योंकि वह हर दिन खुद को नये विचारों से परिष्कृत करता है। जबकि विचारहीन व्यक्ति बाहरी रूप से सक्रिय होते हुए भी अंदर से मृत होता है। वह यंत्रवत जीता है, बिना उद्देश्य, बिना संवेदना। ऐसा व्यक्ति अपने समय का दास होता है; विचारशील व्यक्ति अपने समय का निर्माता।
विचारशीलता के विकास के लिए शिक्षा, संवाद और पठन अत्यावश्यक हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि विचार विकसित करना होना चाहिए। विद्यालय और विश्वविद्यालय ऐसे केन्द्र हों, जहाँ प्रश्न करने की स्वतंत्रता हो। संवाद की संस्कृति भी विचार को गहराई देती है। दूसरों से बातचीत में नए दृष्टिकोण जन्म लेते हैं। अच्छी पुस्तकों का अध्ययन व्यक्ति को गहराई, संतुलन और दिशा देता है। और सबसे बढ़कर आवश्यक है – मौन और आत्ममंथन का समय। जब मनुष्य स्वयं से संवाद करता है, तभी वास्तविक विचार जन्म लेते हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि विचार मनुष्य का प्राण है। जिस प्रकार शरीर भोजन के बिना जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार जीवन विचार के बिना जीवित नहीं रह सकता। पशु भी बिना विचार के जीवन व्यतीत करते हैं, पर मनुष्य का मूल्य उसके विचारों में है। विचार ही उसे प्रकृति से ऊपर उठाकर संस्कृति की ओर ले जाता है। विचारहीनता मनुष्यता का पतन है, जबकि विचारशीलता उसका उत्कर्ष। आज जब संसार भौतिक प्रगति के बावजूद मानसिक अस्थिरता और नैतिक संकट से जूझ रहा है, तब यह वाक्य पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाता है — “विचार ही जीवन का आधार है, विचारहीन मानव पशु के समान है।” क्योंकि जो सोचता है वही जीता है; जो नहीं सोचता, वह केवल अस्तित्व बनाए रखता है। जीवन का सार जीवन नहीं, बल्कि विचार है। जो विचारों से श्रेष्ठ है उसका जीवन उत्तम है ।
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