“उत्कृष्ट कला अनुभव को प्रदर्शित करती है और सत्य को उद्घाटित करती है”

            मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आयाम उसका अनुभव है। अनुभव ही वह तत्व है जो मनुष्य को साधारण जीवों से अलग करता है, क्योंकि अनुभव ही भावनाओं, कल्पना और चिंतन को जन्म देता है। कला इन्हीं अनुभवों की मूर्त अभिव्यक्ति है। जब मनुष्य अपने अनुभवों, संवेदनाओं और विचारों को किसी दृश्य, श्रव्य या साहित्यिक रूप में व्यक्त करता है, तो वह कला बन जाती है। इस कला की उत्कृष्टता इस बात में होती है कि वह किस हद तक मानवीय अनुभव की गहराई को प्रस्तुत कर सके, और किस सीमा तक वह जीवन के सत्य को उद्घाटित कर सके। इसीलिए कहा गया है कि श्रेष्ठ कला केवल सुंदरता नहीं रचती, बल्कि सत्य का साक्षात्कार कराती है।

    कला की उत्पत्ति वस्तुतः मनुष्य के भीतर से होती है। जब व्यक्ति किसी गहन अनुभूति से गुजरता है—चाहे वह आनंद की हो या दुःख की, प्रेम की हो या विरक्ति की—वह इसे किसी रचनात्मक रूप में व्यक्त करने की प्रेरणा प्राप्त करता है। यह प्रेरणा ही कला के जन्म का आधार है। इस दृष्टि से कला मानवीय अनुभव की भाषा है। वह उन जटिल भावनाओं को भी व्यक्त कर देती है जिन्हें शब्दों में कहना कठिन होता है। उदाहरण के लिए, एक चित्रकार जब समुद्र के सूर्यास्त को चित्रित करता है, तो वह मात्र प्रकृति का दृश्य नहीं रचता, बल्कि उस क्षण में निहित शांति, सन्नाटा और समय की गहराई का अनुभव दर्शक तक पहुँचाता है। इसी प्रकार, संगीत का कोई राग, नृत्य की कोई मुद्रा या कविता की कोई पंक्ति हमारे भीतर ऐसी संवेदना को जगाती है जिसे हम केवल भावना के स्तर पर समझ सकते हैं।

    यहाँ से यह विचार उभरता है कि कला का संबंध केवल सौंदर्य से नहीं, बल्कि सत्य से भी है। सत्य का अर्थ यहाँ मात्र तथ्यात्मक या वैज्ञानिक नहीं है, बल्कि वह अस्तित्व का, अनुभव का, और मानवीय चेतना का सत्य है। उत्कृष्ट कला उसी सत्य को खोजती और उद्घाटित करती है। सत्य की यह खोज कभी प्रत्यक्ष रूप में नहीं होती, बल्कि प्रतीकों, रूपकों और सौंदर्य के माध्यम से होती है। इसीलिए कला केवल यथार्थ का अनुकरण नहीं करती, बल्कि उसकी आत्मा को अभिव्यक्त करती है। उदाहरण के लिए, प्रसिद्ध स्पेनिश चित्रकार पिकासो की रचना “ग्वेर्निका” युद्ध की विभीषिका को अभिव्यक्त करती है। यह चित्र केवल एक युद्ध का दृश्य नहीं, बल्कि युद्ध की अमानवीयता और पीड़ा का सार्वभौमिक सत्य उजागर करता है। इसी प्रकार, भारत के कवि रविंद्रनाथ टैगोर की कविताएँ केवल भावनाओं का सौंदर्य नहीं रचतीं, बल्कि उनमें जीवन, प्रकृति और आत्मा के गहरे सत्य प्रवाहित होते हैं।

    भारतीय संस्कृति में तो कला को सीधे आत्मा और परम सत्य के संपर्क का माध्यम माना गया है। नाट्यशास्त्र में कहा गया है कि नाटक जीवन का दर्पण है—“नाट्यम् भिन्नरूपम् जीवनस्य दर्पणम्।” यह विचार बताता है कि कला जीवन के विविध रूपों का अनुगमन करते हुए उसमें निहित अर्थ को सामने लाती है। भरतमुनि ने “रस” को कला का प्राण कहा है। रस का उद्देश्य केवल भावनाओं को जगाना नहीं, बल्कि दर्शक को उस अनुभव तक पहुँचाना है जहाँ वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से ऊपर उठकर सार्वभौमिक भाव से जुड़ जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति कला के माध्यम से किसी महान सत्य का अनुभव करता है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति “करुण रस” से परिपूर्ण नाटक या कविता देखता है, तो वह अपने दुःख को भूलकर समस्त मानवता के दुःख से जुड़ जाता है। यही जुड़ाव सत्य की अनुभूति है—जो कला के माध्यम से संभव होती है।

     हमारे महाकाव्य जैसे रामायण और महाभारत केवल कथा नहीं हैं। वे धर्म, कर्म, नीति और जीवन के शाश्वत सत्य को कलात्मक भाषा में प्रस्तुत करते हैं। वाल्मीकि और व्यास ने मानव जीवन की जटिलताओं को जिस भावनात्मक गहराई और नैतिक दृष्टि से व्यक्त किया, वह किसी दार्शनिक व्याख्यान से कहीं अधिक प्रभावशाली है। इसी प्रकार मंदिरों की मूर्तिकला, भित्तिचित्रों की योजना, रागों के आलाप और नृत्यों की मुद्राएँ सभी मिलकर भारतीय कला को उस ऊँचाई तक ले जाती हैं जहाँ कला और धर्म, सौंदर्य और सत्य, रूप और आत्मा एक हो जाते हैं।

    यदि हम पाश्चात्य दर्शन की ओर देखें, तो वहाँ भी कला और सत्य के संबंध पर निरंतर विमर्श हुआ है। प्लेटो ने कहा था कि कला वास्तविकता की नकल है, इसलिए वह सत्य से दूर ले जाती है। लेकिन अरस्तु ने इस विचार का खंडन करते हुए कहा कि कला जीवन का अनुकरण केवल बाहरी रूप में नहीं करती, बल्कि उसके माध्यम से मानव आत्मा की शुद्धि होती है—जिसे उसने ‘कैथार्सिस’ कहा। यह शुद्धि ही अनुभवजन्य सत्य की अनुभूति है। आगे चलकर टॉल्स्टॉय ने कहा कि कला वह माध्यम है जिसके द्वारा एक व्यक्ति अपनी गहरी अनुभूति को दूसरे तक पहुँचाता है। अगर यह संप्रेषण ईमानदार है, तो कला सत्य के समान पवित्र हो जाती है। इस दृष्टि से कला का मूल्य इस बात में नहीं है कि वह यथार्थ को हूबहू दिखा पाती है या नहीं, बल्कि इस बात में है कि वह हमारे भीतर किसी गहरे सत्य को जागृत करती है या नहीं।

    समाज में कला का एक अन्य महत्त्व यह है कि वह उस यथार्थ को सामने लाती है जिसे अक्सर लोग छिपाना चाहते हैं। सामाजिक दृष्टि से कला एक आईना है जो हमारे समय की त्रुटियों और अन्यायों को उजागर करता है। प्रेमचंद की कहानियाँ, मंटो का साहित्य, या फणीश्वरनाथ रेणु का “मैला आँचल”—ये सभी समाज के उस सत्य को सामने लाते हैं जिसे सत्ता या परंपरा अक्सर दबाने की कोशिश करती है। सिनेमा के क्षेत्र में सत्यजित रे की “पाथेर पांचाली” या बिमल रॉय की “दो बीघा ज़मीन” जैसी फिल्में इस बात का प्रमाण हैं कि उत्कृष्ट कला हमेशा यथार्थ के गहरे सत्य को व्यक्त करती है। वह हमें झकझोरती है, सोचने के लिए बाध्य करती है और भीतर से हमें नया दृष्टिकोण देती है।

    कला सत्य की खोज का माध्यम तो है ही, परंतु वह अनुभव के विस्तार का भी उपकरण है। जब कोई व्यक्ति किसी उत्कृष्ट रचना को देखता या सुनता है, तो उसके भीतर नई संवेदना का जन्म होता है। यह संवेदना केवल सौंदर्य-बोध तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति की चेतना को गहराई देती है। इसीलिए कहा गया है कि कला शिक्षा का सर्वोच्च रूप है। प्लेटो ने कहा था—“कला हमें उस रूप की झलक देती है जो वास्तविकता के मूल में है।” इस कथन का अर्थ यही है कि कला के माध्यम से हम अपने अस्तित्व के गहरे स्तरों तक पहुँच सकते हैं।

    विज्ञान और कला दोनों ही सत्य की खोज में लगे हैं, किंतु दोनों की विधियाँ भिन्न हैं। विज्ञान तथ्यों और तर्क पर आधारित होता है और वह बाहरी जगत के सत्य को खोजता है। जबकि कला अंतर्मन के अनुभव से सत्य को खोजती है। विज्ञान बताता है कि आकाश में इंद्रधनुष कैसे बनता है, जबकि कला यह दिखाती है कि इंद्रधनुष हमारी आत्मा को क्यों आकर्षित करता है। विज्ञान विवरण देता है, कला अर्थ देती है। दोनों की दिशा भिन्न होते हुए भी लक्ष्य समान है—सत्य की प्राप्ति।

    उत्कृष्ट कला की पहचान यह है कि वह हमें जिज्ञासु बनाती है, आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है और हमारे भीतर संवेदनशीलता जगाती है। कला की उत्कृष्टता इस बात में है कि वह ईमानदार हो, सतही न हो, और दर्शक के भीतर एक स्थायी प्रभाव छोड़े। एक महान चित्रकला, एक अमर गीत या एक क्लासिक उपन्यास इसलिए कालातीत बन जाता है क्योंकि उसमें निहित सत्य केवल किसी समय या समाज के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए होता है। उदाहरण के लिए, लियो टॉल्स्टॉय का “वॉर एंड पीस” केवल युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि मानव स्वभाव, प्रेम, भय और आशा के सत्य को उद्घाटित करता है। इसीलिए ऐसी कला पीढ़ियों तक जीवित रहती है, जबकि क्षणिक लोकप्रियता पाने वाली कलाएँ समय के साथ विलुप्त हो जाती हैं।

   समकालीन युग में जब कला उपभोक्तावाद और बाजारवाद से प्रभावित हो रही है, तब यह प्रश्न उठता है कि क्या आज भी कला सत्य का अन्वेषण कर पा रही है? आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्मों पर अधिकांश कलाएं मनोरंजन के लिए हैं, अनुभव के लिए नहीं। परंतु इसके बीच भी अनेक कलाकार ऐसे हैं जो समाज के मूल प्रश्नों को कला के माध्यम से उठाते हैं। स्ट्रीट आर्ट, नाटक, वृत्तचित्र, विरोध गीत—ये सभी आधुनिक युग में भी कला और सत्य के संबंध को पुनः जीवित रखे हुए हैं। किसी दीवार पर महिला अधिकारों या पर्यावरण रक्षा के पक्ष में बना चित्र केवल सजावट नहीं, बल्कि सामाजिक सत्य की अभिव्यक्ति है।

   कला का सबसे बड़ा मूल्य यह है कि वह हमें भीतर से मानवीय बनाती है। जब हम किसी पीड़ित पात्र के दुःख से संवेदना रखते हैं, किसी गीत से प्रभावित होते हैं, या किसी कविता में अपने जीवन का अर्थ ढूँढते हैं, तब हम अपने अनुभव को विस्तारित करते हैं। यह विस्तार ही हमें सत्य के निकट ले जाता है। इसीलिए कहा गया है कि कला आत्मा की भाषा है — वह जो शब्दों से परे है, परंतु मानवीय अनुभूति में सजीव है।

   भारत जैसे देश में, जहाँ कला जीवन के हर आयाम में व्याप्त है, यह विचार और भी प्रासंगिक हो जाता है कि उत्कृष्ट कला अनुभव और सत्य दोनों की संगमस्थली है। यहाँ लोकगीतों में जीवन की व्यथा है, लोकनाट्य में समाज का व्यंग्य है, और पारंपरिक भित्तिचित्रों में प्रकृति का सहज सौंदर्य है। हमारी कला हमेशा व्यक्ति और प्रकृति, आत्मा और ब्रह्म के बीच सेतु रही है। यह केवल अभिव्यक्ति नहीं, साधना है—एक आध्यात्मिक प्रक्रिया, जिसके माध्यम से मनुष्य अपनी सीमाओं से ऊपर उठकर सम्पूर्णता का अनुभव करता है।

   इस समस्त चर्चा के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि उत्कृष्ट कला वह है जो केवल रूप या सौंदर्य तक सीमित न रहकर मानव अनुभव की गहराइयों को उद्घाटित करे और उसमें छिपे सत्य को प्रकाश में लाए। कला हमें यह सिखाती है कि सत्य केवल तर्क या प्रमाण से नहीं, बल्कि अनुभव और संवेदना से भी जाना जा सकता है। जब कोई रचना हमें भीतर से झकझोर देती है, जब वह हमें अपने जीवन के अर्थ पर विचार करने को मजबूर करती है, तो वह केवल कला नहीं रह जाती—वह स्वयं सत्य का रूप धारण कर लेती है।

     अतः यह कहा जा सकता है कि उत्कृष्ट कला वह शक्ति है जो अनुभव को रूप देती है और सत्य को उजागर करती है। वह हमें यह बोध कराती है कि सुंदरता और सत्य अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही तत्व के दो रूप हैं। कला वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी सीमित संवेदनाओं से ऊपर उठकर सार्वभौमिक चेतना का अनुभव करता है। और तभी उसकी रचना अमर बनती है—क्योंकि उसमें निहित अनुभव और उद्घाटित सत्य समय, संस्कृति और भाषा की सीमाओं को पार कर जाता है। उत्कृष्ट कला इसी अमरता की निशानी है—जहाँ अनुभव सौंदर्य बनता है, और सौंदर्य सत्य का साक्षात्कार कराता है।

आशीष ✍️ 

विशेषज्ञ निबंध संकाय 

Mainstream ✍️

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