कभी बैठ कर चाय पर तेरे मेरे इश्क की चर्चा कर लेंगे ....

कभी चमकती आ जाना
किरणों की तरह किसी सुबह
हमारे दिल में भी
वहाँ बैठ कर
चाय पर 
तेरे-मेरे इश्क 
की चर्चा कर लेंगे
वो क्या है ना कि 
बाहर महफूज नहीं 

ऐसा नहीं कि
जगह नहीं
पर यूँ हीं
हम कहीं भी
मिल सकते
तो नहीं जी
आप खास हो
खूबसूरत एहसास हो
ना दूर हो 
ना पास हो
जीने की
तलाश हो

दरिया किनारे
या झील में
तनहाई में 
या महफ़िल में
इस दिल में
या उस
दिल में

मिलोगी तो 
कहीं ना कहीं
अभी नहीं
तो फिर कभी
ना तुम अनजान
ना हम अजनबी

वहीं होगी
फिर एक
शाम हंसी
भूल कर
सारी हदें
ना करवटें
ना सिलवटें
बस तुम
और मैं
हाँ बस मैं
और तुम
एक दूजे
में गुम
फिर तेरे-मेरे
धड़कनों की
धुन

अब सुन
कुछ मेरी
मैं सुनूँ
तेरी
ना कोई
दीवार
ना कोई
दरार
इस पार
उस पार
हर बार 
साँसों पे
साँसों का
वार

ना कोई तलब
ना तड़प
ना कोई बहस
ना झड़प
बस खामोशी से
नजरों का
नजरों से
महज होता रहे
संवाद
क्या सुबह
और क्या शाम
चलती रहे
तू मेरे 
साथ - साथ
दिन - रात
बस अधरों से
अधरों के
जज्बात

तू सिल्क सी फिसल कर
मचल कर 
सम्भल कर
कभी इस डगर
तो कभी उस डगर
मैं बेफिकर
ना कुछ फिकर
लगे यहाँ
क्या किसी की नजर
जब तू मेरे अंदर
मैं तेरे अंदर
दरिया भी सोख ले
आज समंदर

मैं बारिश बनूँ
तेरी खुशी
मैं धूप बनूँ
तेरी नमी
मैं ओस सा
तू शबनमी
मैं आकाश सा
तू है जमीं
ना अब रहे 
कोई कमी
कुछ अनकही
कुछ अनसुनी
तेरी मेरी
कहा-सुनी
अब हार क्या
अब जीत क्या 
सबकुछ तेरा 
सबकुछ मेरा

अब हार क्या
अब जीत क्या 
सबकुछ तेरा 
सबकुछ मेरा

अब हार क्या
अब जीत क्या 
सबकुछ तेरा 
सबकुछ मेरा

सोचा यही
अभी-अभी

देखा यही
अभी-अभी

कभी चमकती आ जाना 
किरणों की तरह किसी सुबह 
हमारे दिल में भी 
वहाँ बैठ कर 
चाय पर 
तेरे-मेरे इश्क 
की चर्चा कर लेंगे
वो क्या है ना कि 
बाहर महफूज नहीं

#AK47

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