मित्रों , जीवन संघर्ष का ही तो दूसरा नाम है पर अपने स्तर से ऊपर उठने के बाद कुछ लोगों को ये भ्रम हो जाता है कि उनसे बेहतर कोई और हो ही नहीं सकता । सच ही तो कहा गया है कि सर्वश्रेष्ठ की संकल्पना खुद को अभिमानी बनाने की अवधारणा मात्र है । खैर जो भी हो कौन क्या कर रहा है इससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि हम इस विषय पर ध्यान केंद्रित करे कि हम क्या कर सकते है , कैसे कर सकते है और कितना कर सकते है । शिक्षा का बाजारीकरण आधुनिक युग की एक बड़ी समस्या है जिसमें बेचारे छात्र समूह हर दिन पीस रहे है , जब ये अवांछनीय दबाव मानसिक चेतना को जागृत करती है तो विचलित मन एक नए विकल्प की तलाश करने लगता है , एक ऐसा संस्थान जो छात्रों की व्यथा को समझे और उनके हित के लिए दिन रात प्रयासरत हो । कहने को तो सभी अपने अपने हिसाब से अपनी दुकान ही चला रहे है पर क्या ये विशाल छात्र परिवार बस खरीदार बन कर ही रह जाए और हर वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर खुद को ठगा हुआ और छला गया महसूस करे ये सही है , अगर ये नियति और परम्परा बन गई है तो हम इसे बदलना चाहते है । हम छात्रों के साथ जुड़कर उनकी हर एक समस्या हर एक पह...
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