कोरा कागज है जिन्दगी

जिसने जैसा लिखा जितना लिखा
उसकी वैसी है जिन्दगी
कोई इसके ईशारे पर नाचता चला गया
किसी ने इसे अपनी उँगलियों पर नचाया
कोई खड़ा रहा , कोई अड़ा रहा , कोई तन्हा पड़ा रहा
कोई इसके ईशारे कभी समझ ना पाया
कुछ लिख-लिख कर मिटाते रहे
कुछ खुद का लिखा छिपाते रहे
कुछ ने औरों का लिखा छाप दिया
कुछ औरों को लिखना सिखाते रहे
अपनी पहचान अपनी शान है जिन्दगी
औरों की नजर में बस पल भर की मेहमान है जिन्दगी
खुद की अदालत में खुद की वकालत है जिन्दगी
मिल गई तो पूरी वरना अधूरी मोहब्बत है जिन्दगी
कभी कायनात , कभी कयामत तो कभी आफत है जिन्दगी
लिखा नहीं तो सीखा नहीं आखिर दास्तानों में दबी कभी परिचित तो कभी अजनबी
रंगों से भरी रंगीन दुनिया में रंगहीन सी , बारीक सी , महीन सी
कभी उलझी तो कभी सुलझी
कोरा कागज है जिन्दगी ........

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