खुशियों का घर !

इक ख्वाहिशों का महल जो कभी था
चंद अपनों के बीच सपनों के गाँव में !

मगर ! कुछ अपनों से दूर ; आज मजबूर
वो मगरूर ! जो छूट गए शहर की भागम-भाग में !!

✍️ shabdon_ke_ashish ✍️

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