अभ्यर्थी की व्यथा ✍️


मेरे तलमलाने पे यूँ ना उँगली उठाओ
अभ्यर्थी हूँ कोई शराबी नहीं हूँ
किसी भी वजह से सर को झुका दे जो
मैं ऐसी कोई खराबी नहीं हूँ

पढ़ा लिखा नशा है
मेहनती आँखों में चढ़ गया होगा
फिर किसी किताब के
मोहब्बत में पड़ गया होगा

उतर जायेगा
या फिर और बढ़ जायेगा
फ़िलहाल कोई भविष्यवाणी नहीं होगी
इस नशे से बच गई जो जवानी उसकी अलग कहानी रही होगी

उतार कर आप ही उतर जाएगा ये किसी नई नवेली प्रतियोगिता का नशा
या फिर किसी पुराने इम्तिहान की भेंट चढ़ जाएगा बिगाड़ कर आप ही अपनी दशा

वो जो सवाल उठा रहे है मेरे हाल पे
शक है जिन्हें जरा सा भी मेरी चाल पे
उनसे मेरा एक सवाल है
कभी तड़के जल्दी जग के घनघोर अंधेरे में
नहा धो कर निकलना पड़े पहले सवेरे के
जूझ कर समय और सवाल से
झुर्रियों से काले फ़टे होंठ जो थे हल्के गुलाबी या फिर लाल से
दिन भर की अनवरत थकान के बिस्तर करीब हो
दर्द से टूटता हर एक अंग फिर नींद कैसे नसीब हो
करवट बदलने की चाहत में भी हालत अजीब हो
भगवान ना करें कि कोई इतना गरीब हो

सफल हो गए जो कल तो कहेंगे ये उस पल
कि हम आज इनको जलाने लगे है

पैर तो आपके भी रहे है कांप
क्या आप भी मैख़ाने में जाने लगे है
या फिर सूंघ कर मेरी खुशी के मैक़दे
आप भी यूँ ही तलमलाने लगे है

मेरे तलमलाने पे यूँ ना उँगली उठाओ
अभ्यर्थी हूँ कोई शराबी नहीं हूँ
किसी भी वजह से सर को झुका दे जो
मैं ऐसी कोई खराबी नहीं हूँ .....

🌱SwAsh🌳

Comments