तुम रुक जाते हो ना हर बार कुछ नया , कुछ बड़ा करने से पहले आज भी । दरअसल ये रुकने की आदत तुम्हारी कमजोरी नहीं है ये तो वो ताकत है जिसे तुम्हारे अंदर पिरोया गया है बचपन से - हार जाने का डर । मगर अपने भीतर के भय को तो तुमने कई दफा हराया है ,इसी उठा पटक ने तो तुम्हे जीना सिखाया है । तो फिर विचलित है क्यों तुम्हारे मन का अर्जुन एक बार फिर जीवन के महाभारत से ,सफलता तो संघर्ष से ही मिलती है ये परम् सत्य है । अंतर बस इतना है कि इस युद्ध में पार्थ भी तुम हो और रघुनाथ भी तुम ही । तो फिर अविलंब आरंभ करो बिना किसी संदेह के लक्ष्य तुम्हारा सामने है । Shabdon_ke_Ashish ✍️
मित्रों , जीवन संघर्ष का ही तो दूसरा नाम है पर अपने स्तर से ऊपर उठने के बाद कुछ लोगों को ये भ्रम हो जाता है कि उनसे बेहतर कोई और हो ही नहीं सकता । सच ही तो कहा गया है कि सर्वश्रेष्ठ की संकल्पना खुद को अभिमानी बनाने की अवधारणा मात्र है । खैर जो भी हो कौन क्या कर रहा है इससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि हम इस विषय पर ध्यान केंद्रित करे कि हम क्या कर सकते है , कैसे कर सकते है और कितना कर सकते है । शिक्षा का बाजारीकरण आधुनिक युग की एक बड़ी समस्या है जिसमें बेचारे छात्र समूह हर दिन पीस रहे है , जब ये अवांछनीय दबाव मानसिक चेतना को जागृत करती है तो विचलित मन एक नए विकल्प की तलाश करने लगता है , एक ऐसा संस्थान जो छात्रों की व्यथा को समझे और उनके हित के लिए दिन रात प्रयासरत हो । कहने को तो सभी अपने अपने हिसाब से अपनी दुकान ही चला रहे है पर क्या ये विशाल छात्र परिवार बस खरीदार बन कर ही रह जाए और हर वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर खुद को ठगा हुआ और छला गया महसूस करे ये सही है , अगर ये नियति और परम्परा बन गई है तो हम इसे बदलना चाहते है । हम छात्रों के साथ जुड़कर उनकी हर एक समस्या हर एक पह...
ना पतंग है ना डोर है ना लाई-तिलवे का शोर है ये साँझ है या भोर है वो उत्साह अब किस ओर है क्या ठंड ही बेजोड़ है या फिर मन में ना अब जोर है हर तरफ पसरी शांति है ये कैसी मकरसंक्रांति है हृदय में बसी एक भ्रांति है कहाँ वो बचपना कांति है चूड़ा पड़ा है झोले में सब बैठे कंबल खोले में पैकेट से बाहर झांक रहा है तिलकुट नहा धो के आ जाओ घर के घाट चित्रकुट दही जमी है हांडी में खाने की ना गारंटी है सब्जी काट रही है माँ पर नहाओगे कब ना डांट रही है माँ बच्चे थे तो सुबह सुबह बिना पूछे कर दिया जाता था पानी के हवाले मजाल है जो बिना डुबकी लगाये कुछ भी खा ले खिचड़ी की खुशबू जब आती थी रसोड़े से चूहे दौड़ने लगते थे सूरज के सातवें घोड़े से पापड़ घी कुरकरी चटनी चोखा अचार देख कर एक साथ कैसा हो विचार यूँ तो है ये बस एक दिन का त्यौहार पर इसके नाम में ही रात है दिन जैसा दिख रहा सब कह रहे सकरात है अगर ये पढ़ कर आपके मुँह में पानी है तो समझ जाओ की जिंदगी में अभी बाकी कहीं ना कहीं वो हसीं बचपन की कहानी है @shabdon_ke_ashish ✍️
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