चार आने का सुख !


मैं अकेला नहीं हूँ मेरी ही तरह शायद सबका ही कभी ना कभी तो ये भरम जरूर टूटा होगा कि साख जैसी कोई चीज नहीं होती । सदियों तक शासन करने वाले बड़े-बड़े साम्राज्य और युगों तक उत्कर्ष करने वाली सभ्यताओं की तरह साख का भी पतन होता है । हम जिस संस्था से जब तक जुड़े रहते है या फिर हमारे जुड़े रहने की संभावनाएं साँस लेते रहती है , तब तक हम वहाँ जिंदा रहते है और जैसे-जैसे वक़्त बीतता है ये दूरी लोगों के मन और मस्तिष्क में हमारी स्पष्ट और स्थायी छवि को धूमिल करते जाती है । और एक दिन ऐसा भी आता है जब बाहरी दुनिया में जीवंत होने के बावजूद हम उस चारदीवारी के अंदर दम तोड़ चुके होते है पर सबसे बड़ी बात ये है कि अब वहाँ जान कर भी कोई जानने वाला नहीं होता । दरअसल जिस परिश्रम से पाई विरासत को हम अपनी साख समझ बैठे होते है वो बचपन में हथेली पर पड़े किसी चार आने के सुख की तरह है जिससे हम कभी दुनिया खरीदना चाहते थे .....

@shabdon_ke_ashish ✍️

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