वैरागी हूँ पर मंजिल वैराग नहीं !


सच ही तो है समय और परिस्थितयाँ मनुष्य से सबकुछ मनवा लेती है भले आप मन से इसे स्वीकार ना करें पर समझौता ही सही यही है जिन्दगी ।

तभी तो हम वहाँ पहुँच जाते है जो हमारे दिलोदिमाग के दरमियाँ कभी था ही नहीं और फिर शुरू होती है आदमी की आदमियत से जंग दरअसल आत्मा की आत्मसम्मान से लड़ाई । एक तरफ हमारी चाहत ,हमारी ख्वाहिशें होती है और एक तरफ सकल समाज यानी ये दुनिया और इसी विरोधाभास की सड़क के बीचोबीच मुसाफ़िर की तरह सफर करते है हम । यकीन मानिए बड़े खुशनशिब है वो चंद लोग जो अपनी चाहत की तरफ बढ़ रहे है थोड़ा और थोड़ा और थोड़ा और , वरना जो दुनिया की तरफ से है वो तो भीड़ में भी आजीवन अकेला ही रह जाता है ....

और जिंदा रहती है तो बस एक कसक कि पहले क्यों ना मिले हम ?

@shabdon_ke_ashish ✍️

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